बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

भूत, वर्तमान और भविष्य के तिराहे पर तनकर खड़ा

भूत, वर्तमान और भविष्य के तिराहे पर तनकर खड़ा 

मुझे कोई निश्चित तारीख  तो याद नहीं  आ रही जब मैं पहली बार डॉ. साहब से मिला . पर लगता है की ६-७ साल तो जरूर हो गए होंगे. हाँ पर इतना याद है की पहली ही मुलाक़ात में डॉ. साहब की सादगी का मैं कायल हो गया . मैंने डॉ. साहब से पहली मुलाक़ात के पहले उनको अख़बारों में पढ़ा था . मेरे मन में उनकी जो छवि बनी थी मैंने उनको वैसा ही पाया . बस, एक अंतर यही था की मैंने कल्पना की थी की वो काफी धीर-गंभीर और युवाओं से थोडा  परहेज़ करते होंगे . पर मेरी यही धरना गलत साबित हुयी. चित्रशाला में यूं तो भागलपुर के लगभग सभी साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ. पर मन तीन लोगों से काफी घुल-मिल गया . रंजन , शिव कुमार  शिव और तीसरे डॉ. अमरेन्द्र. भागलपुर के साहित्याकाश में मेरे जैसे युवक की स्वीकार्यता कोई आसन बात नहीं थी. ये डॉ. साहब की कृपा से ही संभव हो पाया ..चित्रशाला में रोज जमती चौकड़ियों का डॉ. साहब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. पिछले ६-७ सालों में भागलपुर ने के साहित्य जगत में जितने भी काम हुए मैं उनका प्रत्यक्ष गवाह रहा हूँ. इन सालों में एक परिवर्तन यह हुआ की  डॉ. अमरेन्द्र  मेरे लिए अमरेन्द्र भैया हो गए .